देहरादून/हरिद्वार।
उत्तराखंड में प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। 40वीं वाहिनी पीएसी हरिद्वार में तैनात एक दलनायक की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का शासनादेश करीब दो महीने तक पुलिस मुख्यालय तक पहुंच ही नहीं पाया। नतीजतन, जिस अधिकारी की सेवाएं दिसंबर 2025 में समाप्त होनी थीं, वह फरवरी 2026 तक नौकरी करता रहा।
मामला उजागर होने के बाद अब इसकी जांच डीआईजी पीएसी को सौंपी गई है, जबकि पूरे घटनाक्रम को विभागीय स्तर पर गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार 40वीं वाहिनी पीएसी में तैनात दलनायक खजांची लाल पर वर्ष 2025 में कई गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे। विभागीय जांच कराई गई, जिसमें आरोप सही पाए गए। इसके बाद गृह विभाग ने भी स्वतंत्र जांच कराई।
सभी तथ्यों के आधार पर मुख्यमंत्री के अनुमोदन से 16 दिसंबर 2025 को खजांची लाल की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश जारी कर दिया गया। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे आदेश दो-चार दिनों के भीतर पुलिस मुख्यालय पहुंच जाते हैं, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
दो महीने तक लटका रहा आदेश
हैरानी की बात यह रही कि करीब दो माह तक यह शासनादेश पुलिस मुख्यालय तक नहीं पहुंच सका। इस दौरान संबंधित अधिकारी नियमित रूप से सेवा में बना रहा। जब विभागीय अधिकारियों को इस चूक की जानकारी हुई, तब 4 फरवरी 2026 को शासन की अनुमति लेकर आईजी पीएसी स्तर से दोबारा सेवानिवृत्ति का आदेश जारी करना पड़ा।
जांच के आदेश, जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज
इस पूरे प्रकरण को गंभीर मानते हुए डीजीपी दीपम सेठ ने जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया कि मामले की जांच डीआईजी पीएसी मुकेश कुमार को सौंपी गई है और जल्द से जल्द रिपोर्ट तलब की गई है।
डीजीपी के अनुसार,
“यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है। यह जांच का विषय है कि आदेश बीच में कैसे रुका और कहीं यह गलत हाथों में तो नहीं चला गया।”
सिस्टम पर उठे सवाल
इस घटना ने एक बार फिर शासन से लेकर पुलिस मुख्यालय तक की फाइल मूवमेंट प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि समय रहते मामला सामने न आता, तो अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश लंबे समय तक दबा रह सकता था।
अब देखना यह होगा कि जांच रिपोर्ट में लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान हो पाती है या नहीं, और क्या उनके खिलाफ कार्रवाई होती है।












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