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जौनसारी ST का दर्जा सिर्फ जाति या क्षेत्र से भी जुड़ा है मामला? पुराने दस्तावेजों ने खोली परतें

October 21, 2026
in उत्तराखंड
जौनसारी ST का दर्जा सिर्फ जाति या क्षेत्र से भी जुड़ा है मामला? पुराने दस्तावेजों ने खोली परतें
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जौनसार-बावर में ST प्रमाणपत्र को लेकर पुराना विवाद फिर चर्चा में है। 1965 की लोकुर समिति, 1967 के राष्ट्रपति आदेश, 1969 की संसदीय समिति और 2003 के राज्यसभा जवाब के दस्तावेजों में जौनसारी पहचान को लेकर अहम तथ्य सामने आते हैं। दस्तावेज बताते हैं कि जनजातीय पहचान और क्षेत्रीय संबंध, दोनों इस विवाद का हिस्सा रहे हैं।

रिपोर्ट: नीरज उत्तराखंडी

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1967 में ST सूची, 2003 में ‘क्षेत्रीय शब्द’! जौनसारी पहचान पर सवाल बरकरार

देहरादून/चकराता। उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र की पात्रता को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। इस मामले से जुड़े पुराने सरकारी, संवैधानिक और संसदीय दस्तावेजों की पड़ताल में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। वर्ष 1965 की लोकुर समिति की रिपोर्ट से लेकर 1967 के राष्ट्रपति आदेश, 1969 की संयुक्त संसदीय समिति के रिकॉर्ड और 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में दिए गए केंद्र सरकार के जवाब तक, अलग-अलग दस्तावेज जौनसारी पहचान के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं।

इन दस्तावेजों से एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—क्या जौनसारी ST पहचान केवल किसी विशेष समुदाय तक सीमित है या इसमें जौनसार क्षेत्र से जुड़ा पहलू भी शामिल रहा है? साथ ही, क्या जौनसार-बावर में वर्तमान निवास मात्र से किसी व्यक्ति को ST प्रमाणपत्र का अधिकार मिल जाता है?

उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इन सवालों का जवाब देते समय ऐतिहासिक रिकॉर्ड और संवैधानिक प्रावधानों के बीच अंतर समझना जरूरी है।

1965 की लोकुर समिति ने जौनसारी को जनजातीय समूह के रूप में देखा

अनुसूचित जनजातियों की सूची की समीक्षा करने वाली लोकुर समिति की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की ‘Jaunsari’ प्रविष्टि का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट में जौनसारी समुदाय को जनजातीय समूह के रूप में वर्णित किया गया था। इसमें देहरादून, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी के क्षेत्रों में इसके निवास का उल्लेख भी किया गया।

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें कुछ ब्राह्मण और राजपूत समूहों को ‘फॉरवर्ड ग्रुप्स’ बताते हुए अलग रखने का उल्लेख किया गया था। इससे संकेत मिलता है कि उस समय जौनसारी पहचान और उससे जुड़े विभिन्न सामाजिक समूहों पर सरकारी स्तर पर विचार किया जा रहा था।

हालांकि, लोकुर समिति की रिपोर्ट और अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक सूची को एक ही दस्तावेज नहीं माना जा सकता। अंतिम संवैधानिक सूची राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से निर्धारित की गई थी।

1967 का राष्ट्रपति आदेश क्या कहता है?

24 जून 1967 को संविधान के अनुच्छेद 342(1) के तहत Constitution (Scheduled Tribes) (Uttar Pradesh) Order, 1967 जारी किया गया था। इस आदेश की अनुसूची में क्रम संख्या तीन पर ‘Jannsari’ नाम दर्ज है।

इस प्रविष्टि में जौनसार-बावर के प्रत्येक निवासी को अनुसूचित जनजाति मानने वाला कोई अलग स्पष्ट वाक्य नहीं है। दूसरी ओर, अनुसूची में कुछ अन्य समुदायों के लिए जिला आधारित सीमाओं का भी उल्लेख किया गया था।

यही कारण है कि ST प्रमाणपत्र की पात्रता पर चर्चा करते समय मूल राष्ट्रपति आदेश की भाषा को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, किसी विशेष व्यक्ति की पात्रता का निर्णय केवल इस एक तथ्य के आधार पर नहीं, बल्कि लागू कानूनी प्रावधानों और सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार किया जाना चाहिए।

1969 की संसदीय समिति के रिकॉर्ड में कोल्टा समुदाय का भी उल्लेख

जौनसारी ST पहचान से जुड़े दस्तावेजों में वर्ष 1969 की संयुक्त संसदीय समिति का रिकॉर्ड विशेष महत्व रखता है।

इस समिति के दस्तावेज में कोल्टा समुदाय के संबंध में यह टिप्पणी दर्ज होने का उल्लेख है कि उसे ‘Jaunsari’ प्रविष्टि के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल किया गया था।

यह तथ्य जौनसारी ST पहचान को केवल किसी एक सामाजिक समूह तक सीमित करके देखने के संबंध में महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। संसदीय रिकॉर्ड में कोल्टा समुदाय का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि उस समय जौनसारी प्रविष्टि के संदर्भ में विभिन्न सामाजिक समूहों की स्थिति पर विचार किया गया था।

कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पहले भी जांच हुई थी। वर्ष 1963 की कोल्टा जांच समिति की रिपोर्ट में कर्ज के बदले श्रम, आर्थिक शोषण और पीढ़ियों तक चलने वाली निर्भरता जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया था। हालांकि, उस समिति का काम सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जांच करना था, न कि किसी समुदाय को संवैधानिक रूप से ST घोषित करना।

2003 के राज्यसभा जवाब ने बढ़ाई बहस

इस पूरे मामले में 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में केंद्र सरकार की ओर से दिया गया जवाब भी महत्वपूर्ण है।

उपलब्ध दस्तावेजी विवरण के अनुसार, केंद्र सरकार ने ‘Jaunsari’ को “a territorial term encompassing all the residents of the area” बताया था। जवाब में यह भी कहा गया था कि जौनसार क्षेत्र में रहने वाले कोल्टा और बाजगी समुदायों के लोग निर्धारित शर्तों के अधीन जौनसार के नाम पर ST लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

इस जवाब में 24 जून 1967 को संबंधित दावेदार या उसके माता-पिता के जौनसार क्षेत्र का स्थायी निवासी होने की शर्त का भी उल्लेख किया गया था।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। वर्ष 2003 का राज्यसभा जवाब केंद्र सरकार की आधिकारिक व्याख्या को दर्शाता है, जबकि 1967 का राष्ट्रपति आदेश संवैधानिक सूची का मूल दस्तावेज है। दोनों का महत्व है, लेकिन दोनों की कानूनी प्रकृति एक जैसी नहीं है।

इसी अंतर के कारण जौनसारी ST पहचान को लेकर समुदाय आधारित और क्षेत्र आधारित व्याख्याओं पर बहस बनी हुई है।

2001 में खस जौनसारियों की ST स्थिति पर भी उठा था सवाल

इस विवाद से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण कड़ी वर्ष 2001 का केंद्र और राज्य सरकार के बीच पत्राचार है।

2017 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से खस जौनसारियों, विशेषकर ब्राह्मण और राजपूत समूहों की ST स्थिति के संबंध में भेजे गए पत्र का उल्लेख मिलता है। इसी न्यायिक रिकॉर्ड में राज्य सरकार के एक पत्र का भी जिक्र है, जिसमें मूल प्रविष्टि को बनाए रखने के संबंध में सुझाव का उल्लेख किया गया था।

हालांकि, उपलब्ध विवरण में दोनों पत्रों के क्रम और उनके बीच के संबंध को पूरी तरह स्थापित करने वाली मूल फाइल मौजूद नहीं है। इसलिए इस पत्राचार के आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित मूल दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है।

2017 में हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

‘Chatar Dutt Joshi v. State of Uttarakhand’ मामले में जौनसार क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्ति की ST प्रमाणपत्र संबंधी पात्रता का मुद्दा सामने आया था।

मामले के रिकॉर्ड में 1967 के राष्ट्रपति आदेश, जौनसारी प्रविष्टि और केंद्र-राज्य पत्राचार का उल्लेख था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने यह अंतिम घोषणा नहीं की कि जौनसार-बावर में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतः ST है या सभी जौनसारी प्रमाणपत्र अवैध हैं। संबंधित विवाद को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष तय करने का निर्देश दिया गया था।

इसलिए इस फैसले को किसी एक पक्ष के पक्ष में अंतिम संवैधानिक घोषणा के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

केंद्र की मौजूदा सूची में जौनसारी ST का नाम बरकरार

जनजातीय कार्य मंत्रालय की राज्यवार सूची में उत्तराखंड के लिए पांच अनुसूचित जनजातियों का उल्लेख है। इनमें भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू शामिल हैं।

उपलब्ध आधिकारिक सूची में जौनसारी प्रविष्टि का बने रहना यह स्पष्ट करता है कि इसे अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाया नहीं गया है। हालांकि, सूची में किसी समुदाय का नाम होना और किसी विशेष व्यक्ति की प्रमाणपत्र संबंधी पात्रता तय होना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

जौनसारी ST विवाद में दस्तावेजों से निकलने वाले प्रमुख निष्कर्ष

पुराने सरकारी और संसदीय दस्तावेजों को साथ रखकर देखने पर कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं।

पहला, वर्ष 1965 की लोकुर समिति ने जौनसारी को जनजातीय समूह के रूप में वर्णित किया था और कुछ ब्राह्मण तथा राजपूत समूहों को अलग रखने का उल्लेख किया था।

दूसरा, वर्ष 1967 के राष्ट्रपति आदेश में ‘Jannsari’ को अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक प्रविष्टि के रूप में दर्ज किया गया।

तीसरा, वर्ष 1969 की संयुक्त संसदीय समिति के रिकॉर्ड में कोल्टा समुदाय को ‘Jaunsari’ प्रविष्टि के अंतर्गत शामिल किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह जौनसारी पहचान को किसी एक संकीर्ण सामाजिक श्रेणी तक सीमित करने के दावे पर सवाल उठाता है।

चौथा, वर्ष 2003 के राज्यसभा जवाब में जौनसारी पहचान को क्षेत्रीय संदर्भ में भी समझाया गया और 24 जून 1967 की स्थायी निवास संबंधी शर्त का उल्लेख किया गया।

पांचवां, वर्तमान निवास मात्र को ST प्रमाणपत्र की स्वतः पात्रता का पर्याप्त आधार मानने के निष्कर्ष का समर्थन उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं मिलता। किसी व्यक्ति की पात्रता लागू संवैधानिक आदेश, संबंधित मानदंडों और वैध दस्तावेजों के आधार पर तय की जानी चाहिए।

निष्कर्ष: जौनसारी ST पहचान में समुदाय और क्षेत्र, दोनों अहम

जौनसारी ST दर्जे से जुड़े 59 साल पुराने दस्तावेज एक जटिल ऐतिहासिक और प्रशासनिक तस्वीर सामने रखते हैं। लोकुर समिति की जनजातीय समूह संबंधी व्याख्या, 1967 का राष्ट्रपति आदेश, 1969 में कोल्टा समुदाय का संसदीय रिकॉर्ड में उल्लेख और 2003 का क्षेत्रीय संदर्भ वाला केंद्रीय जवाब—इन सभी को एक साथ समझना जरूरी है।

दस्तावेजों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जौनसार-बावर का हर वर्तमान निवासी केवल निवास के आधार पर स्वतः ST प्रमाणपत्र का पात्र है। इसी तरह, जौनसारी ST पहचान को केवल एक कथित उच्च या मूल जाति तक सीमित करने का दावा भी 1969 के संसदीय रिकॉर्ड के संदर्भ में सवालों के घेरे में आता है।

इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति तय करते समय मूल राष्ट्रपति आदेश, संबंधित सरकारी निर्देशों, आधिकारिक प्रमाणों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय को आधार बनाना आवश्यक होगा।

दस्तावेजी पड़ताल: नीरज उत्तराखंडी

नोट: इस रिपोर्ट के आधार में 21 अगस्त 1980 के उत्तर प्रदेश शासन पत्र और 2001–03 की पूरी केंद्रीय मंत्रालयी फाइल की मूल प्रतियां उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख है। इसलिए इन दस्तावेजों से जुड़े कुछ प्रशासनिक पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है।

 

Tags: dehradun newsJaunsar-BawarJaunsari ST StatusJaunsari TribeLokur CommitteeNeeraj UttarakhandiScheduled TribesST CertificateUttarakhand governmentUttarakhand news
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