देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने देश में बढ़ते एलपीजी गैस और तेल संकट को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पूरे देश में एलपीजी गैस की आपूर्ति को लेकर संकट जैसे हालात बन गए हैं, लेकिन सरकार इसे स्वीकार करने के बजाय जनता को गुमराह कर रही है।
डॉ. रावत ने कहा कि एक ओर सरकार गैस की कमी से इनकार कर रही है, वहीं दूसरी ओर गैस बुकिंग के बीच शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं के लिए 25 और 45 दिनों का अंतर तय कर दिया गया है। इससे साफ है कि गैस आपूर्ति में समस्या है, लेकिन सरकार इसे मानने से बच रही है। उन्होंने कहा कि यह समझ से परे है कि उपभोक्ताओं के बीच इस तरह का भेदभाव क्यों किया जा रहा है, जबकि गैस की आवश्यकता सभी को समान रूप से होती है।
शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण श्रेणी की एजेंसियों से उपभोक्ता परेशान
डॉ. रावत ने बताया कि देहरादून सहित कई शहरों में ऐसी गैस एजेंसियां हैं जो अब नगर निगम या नगर पालिका क्षेत्रों में आती हैं, लेकिन जब उनका आवंटन हुआ था तब वह क्षेत्र ग्रामसभा के अंतर्गत थे। इसी कारण उन्हें ग्रामीण श्रेणी की एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था।
उन्होंने कहा कि आज वे सभी क्षेत्र नगर निगम, नगर पालिका या नगर पंचायत के वार्डों में शामिल हो चुके हैं और वहां रहने वाले उपभोक्ता भी शहरी हैं, लेकिन उन्हें अभी भी ग्रामीण श्रेणी में रखकर 45 दिन बाद गैस बुकिंग की बाध्यता लागू की जा रही है। यह सरकार की अव्यवहारिक और दोहरी नीति है, जिससे आम जनता को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।
डॉ. रावत ने मांग की कि शहरी क्षेत्रों में स्थित ग्रामीण श्रेणी की गैस एजेंसियों को तुरंत शहरी श्रेणी के बराबर सुविधा देते हुए 25 दिन की बुकिंग व्यवस्था लागू की जाए, ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि गैस संकट के चलते सिलेंडरों की कालाबाजारी और जमाखोरी की घटनाएं भी सामने आ रही हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन केवल बयानबाजी तक सीमित हैं।
विदेश और ऊर्जा नीति के कारण बढ़ी आयात पर निर्भरता
डॉ. रावत ने कहा कि यह संकट केंद्र सरकार की अदूरदर्शी विदेश और ऊर्जा नीति का परिणाम है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में भारत लगभग 47 प्रतिशत गैस आयात करता था, जो अब बढ़कर करीब 66 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह तेल आयात भी 83 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 88 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा कि पहले भारत ईरान और खाड़ी देशों से सस्ता और जल्दी मिलने वाला तेल और गैस खरीदता था, लेकिन अब नीतियां बदलने के कारण महंगे विकल्प अपनाने पड़े हैं। खाड़ी देशों से जहाज जहां 6 से 7 दिनों में भारत पहुंच जाते थे, वहीं अमेरिका से आने वाले जहाजों को 55 से 60 दिन तक लगते हैं। इससे लागत कई गुना बढ़ जाती है और इसका सीधा बोझ देश की जनता पर पड़ता है।
मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के दुरुपयोग का आरोप
प्रेस वार्ता के दौरान डॉ. रावत ने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के दुरुपयोग का गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि उधम सिंह नगर और चंपावत जिलों के आंकड़े ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि इस कोष का किस प्रकार दुरुपयोग किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि आरटीआई के तहत इन जिलों में यह जानकारी मांगी गई थी कि किन-किन लाभार्थियों को मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से सहायता दी गई। शुरुआत में सूचनाएं देने में देरी की गई और बाद में अधूरी जानकारी उपलब्ध कराई गई, लेकिन जो आंकड़े सामने आए हैं वे बेहद चौंकाने वाले हैं।
डॉ. रावत ने कहा कि उधम सिंह नगर और चंपावत दोनों ही जिले मुख्यमंत्री से जुड़े हुए हैं, क्योंकि वे पहले खटीमा से विधायक रहे हैं और वर्तमान में चंपावत से विधायक हैं। इन जिलों में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों और उनके परिजनों को हर वर्ष मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से बड़ी रकम दी जा रही है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि सुबोध मजुमदार, भारत सिंह, गोदावरी, कान्ता रानी, भरत बांगा, कामील खान, गजेन्द्र सिंह बिष्ट, पूरन सिंह, संतोष कुमार अग्रवाल, मुकेश शर्मा, शान्ता बडोला और राजेन्द्र प्रसाद जैसे लाभार्थियों को लगभग 5 लाख रुपये तक की सहायता दी गई। वहीं हयात सिंह मेहरा, जो भाजपा कोऑपरेटिव से जुड़े बताए गए हैं, उन्हें 4 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई।
इसके अलावा तारा देवी, जसवीर चौधरी, निकिता खडायत, कुसुम देवी और हेमलता जैसे लाभार्थियों को भी 4 लाख, 3 लाख और 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चंपावत में एक व्यक्ति को बिना नाम के 3 लाख रुपये और एक स्थान पर केवल “अध्यक्ष” नाम से 2 लाख रुपये की सहायता दर्ज की गई है।
पूरे प्रदेश के आंकड़े सामने आए तो बड़ा घोटाला उजागर होगा
डॉ. रावत ने कहा कि यह तो केवल कुछ उदाहरण हैं। यदि पूरे प्रदेश के सभी जिलों के आंकड़े सामने आ जाएं तो यह उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार साबित हो सकता है। उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।
प्रेस वार्ता में मुख्य प्रवक्ता गरिमा माहरा दसौनी, पूर्व महानगर अध्यक्ष लालचंद शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता शीशपाल सिंह बिष्ट, वरिष्ठ नेता विनोद चौहान और श्रम प्रकोष्ठ के दिनेश कौशल भी मौजूद रहे।













