नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। 16 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड का भाव मई के बाद पहली बार 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। हालांकि, कारोबार के अंत में कीमत गिरकर 109.86 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 3.5 प्रतिशत की बढ़त के साथ 101.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
एक सप्ताह के दौरान WTI क्रूड की कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जबकि ब्रेंट क्रूड करीब 5 प्रतिशत चढ़ा। कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल ने दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की आशंका को मजबूत कर दिया है। भारत के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है।
क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं कच्चे तेल के दाम?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के पीछे मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव प्रमुख वजह माना जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ा दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। यहां किसी भी तरह की बाधा आने से तेल उत्पादक देशों से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक होने वाली आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है और कीमतों पर दबाव पड़ता है।
इसके अलावा, मध्य पूर्व में बढ़ते क्षेत्रीय तनाव और सऊदी अरब जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों की उत्पादन एवं निर्यात सुविधाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताओं ने भी बाजार की बेचैनी बढ़ाई है। दूसरी ओर, रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष तथा रूसी रिफाइनरियों पर हमलों से जुड़ी आशंकाएं भी ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रही हैं।
महंगा तेल बढ़ा सकता है वैश्विक महंगाई का दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी रहने से केवल पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के कई दूसरे क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है। तेल महंगा होने से परिवहन, माल ढुलाई, औद्योगिक उत्पादन और विनिर्माण की लागत बढ़ने की आशंका रहती है।
यदि कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ती है, तो उसका असर उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है। इससे रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। वहीं, तेल बाजार में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी कई चुनौतियां पैदा कर सकती है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में तेजी आने से तेल आयात पर होने वाला खर्च बढ़ सकता है।
यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगे स्तर पर बना रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव पैदा हो सकता है। हालांकि, घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव का सीधा और तत्काल अनुमान केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव से नहीं लगाया जा सकता। इसमें सरकारी नीतियों, करों, तेल कंपनियों के मूल्य निर्धारण और रुपये-डॉलर की विनिमय दर की भी भूमिका होती है।
तेल महंगा होने से ट्रक, बस और अन्य परिवहन साधनों का परिचालन खर्च बढ़ सकता है। इसका असर खाद्य पदार्थों, कृषि उत्पादों और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई पर पड़ सकता है। इसके साथ ही, पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक, रसायन और अन्य ऊर्जा-निर्भर उद्योगों की लागत भी बढ़ने की आशंका रहती है।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
कच्चे तेल की कीमतें आने वाले समय में किस दिशा में जाएंगी, यह काफी हद तक मध्य पूर्व में सुरक्षा की स्थिति, प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल की आपूर्ति और रूस-यूक्रेन संघर्ष से जुड़े घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।
यदि तनाव बढ़ता है और तेल की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो कीमतों में और तेजी आ सकती है। इसके विपरीत, हालात सामान्य होने और आपूर्ति संबंधी चिंताएं कम होने पर बाजार को राहत मिल सकती है।
फिलहाल, 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट क्रूड वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ा संकेत है। भारत सहित तेल आयात करने वाले देशों के लिए आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखना अहम होगा, क्योंकि लंबे समय तक महंगा तेल महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।













