दो दशक पुराना विवाद: जानिए मामले की पूरी टाइमलाइन
2007: हाईकोर्ट का पहला बड़ा आदेश
बनभूलपुरा और गफूर बस्ती क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने को लेकर वर्ष 2007 में पहली बार हाईकोर्ट ने आदेश दिए थे। उस समय प्रशासन ने 2400 वर्गमीटर रेलवे भूमि को अतिक्रमण मुक्त भी कराया था।
2013: गौला नदी खनन याचिका से खुला रेलवे भूमि विवाद
याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी ने गौला नदी में अवैध खनन और पुल क्षति को लेकर PIL दायर की। सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि अतिक्रमण का मुद्दा फिर सामने आया।
2016: हाईकोर्ट ने 10 सप्ताह में अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया
9 नवंबर 2016 को अदालत ने रेलवे को सख्त निर्देश दिए कि 10 सप्ताह के भीतर पूरा अतिक्रमण हटाया जाए।
इसके बाद अतिक्रमणकारियों व प्रदेश सरकार ने अदालत में शपथपत्र देकर इस भूमि को नजूल की बताया, लेकिन 10 जनवरी 2017 को यह दावा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।
2017: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
कई विशेष याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने
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अतिक्रमणकारियों
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और प्रदेश सरकार
को निर्देश दिया कि 13 फरवरी 2017 तक व्यक्तिगत प्रार्थना पत्र हाईकोर्ट में प्रस्तुत करें।
कोर्ट ने परीक्षण के लिए 3 माह का समय दिया।
6 मार्च 2017 को कोर्ट ने रेलवे को अप्राधिकृत अधिभोगी बेदखली अधिनियम 1971 के तहत कार्रवाई करने के निर्देश दिए, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इसके बाद जोशी ने अवमानना याचिका दायर की, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही।
2022: हाईकोर्ट की दोबारा सख्ती
21 मार्च 2022 को एक नई PIL में आरोप लगाया गया कि रेलवे भूमि खाली कराने में विफल रहा है।
18 मई 2022 को कोर्ट ने सभी प्रभावित पक्षों को अपने दस्तावेज पेश करने के लिए कहा; लेकिन अतिक्रमणकारी भूमि पर अधिकार साबित नहीं कर पाए।
20 दिसंबर 2022 को हाईकोर्ट ने एक बार फिर रेलवे को 7 दिन का नोटिस जारी कर अतिक्रमण हटाने को कहा। इसके बाद यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।
आज की सुनवाई: हजारों परिवारों की सांसें अटकीं
आज (मंगलवार) सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होनी है।
हल्द्वानी प्रशासन ने क्षेत्र में
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जीरो ज़ोन लागू किया,
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सुरक्षा बल तैनात किए
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और किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की है।
रेलवे का दावा है कि बनभूलपुरा क्षेत्र में उसकी 29 एकड़ भूमि पर लंबे समय से अवैध कब्जा है।
कुल 4365 कब्जों को अतिक्रमण सूची में शामिल किया गया है।
आज का फैसला तय करेगा हजारों लोगों का भविष्य
यह फैसला केवल अवैध अतिक्रमण हटाने से जुड़ा नहीं है, बल्कि इससे
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हजारों परिवारों का निवास
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बच्चों की शिक्षा
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महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा
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और पूरी बस्ती का भविष्य
त्रिशंकु में लटका हुआ है।
सभी की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं










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