देहरादून: गुजरात की राजनीति में हाल ही में आई कैबिनेट फेरबदल की आंधी ने उत्तराखंड की सियासी गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है। सत्ता के गलियारे हों या संगठन के अंदरूनी चबूतरे, हर ओर अब एक ही सवाल तैर रहा है—“क्या उत्तराखंड में भी कुछ बड़ा होने वाला है?” दीपावली की रोशनी में सियासत की छाया कुछ गहरी दिखने लगी है।
गुजरात मॉडल को भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया है। 2021 में अचानक वहां पूरे मंत्रिमंडल को बदलकर नए चेहरे सामने लाए गए थे और फिर उसी रणनीति ने 2022 में पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई। अब एक बार फिर गुजरात में मंत्रिमंडल की सफाई को लेकर जिस तरह से तेज़ी दिखाई गई है, उसने पहाड़ की राजनीति में बेचैनी बढ़ा दी है। देहरादून से दिल्ली तक हर नेता अब इस ‘सियासी नब्ज़’ को पढ़ने में जुटा है।
दरअसल, उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार 2027 तक तो है, लेकिन पार्टी की रणनीति समय से पहले ‘मैदान तैयार’ करने की रही है। 2022 में भी चुनाव से पहले अचानक मुख्यमंत्री चेहरा बदलना इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। त्रिवेंद्र सिंह रावत से तीरथ सिंह रावत और फिर पुष्कर सिंह धामी — यह बदलाव बीजेपी की चुनावी रणनीति का हिस्सा था, जिसने आखिरकार पार्टी को सत्ता में वापसी दिला दी। गुजरात में मौजूदा फेरबदल को भी कई नेता उसी रणनीतिक सिलसिले की एक कड़ी मान रहे हैं।
पार्टी के भीतर यह चर्चा अब ज़ोर पकड़ चुकी है कि नेतृत्व संगठन और सरकार—दोनों में नई ऊर्जा का संचार चाहता है। कई मंत्रियों और विधायकों की परफॉर्मेंस पर पार्टी की नज़र पिछले कई महीनों से टिकी हुई है। कहा जा रहा है कि संगठन के शीर्ष स्तर पर कुछ रिपोर्ट्स केंद्र तक पहुंच चुकी हैं, जिन पर चुपचाप काम चल रहा है। पार्टी हाईकमान की नीति साफ़ है—“काम दिखाओ या घर जाओ।”
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में जहां सत्ता का संतुलन कुछ ही चेहरों पर टिका होता है, वहां कैबिनेट में थोड़ा भी फेरबदल बड़ा राजनीतिक संदेश बन सकता है। यही वजह है कि गुजरात की हलचल ने देहरादून में कई कुर्सियों के नीचे से ज़मीन खिसका दी है। कई मंत्री अब अपनी परफॉर्मेंस रिपोर्ट को लेकर बेचैन हैं, जबकि कुछ नए चेहरे भी सक्रिय हो उठे हैं। संगठन में लंबे समय से ‘साइड लाइन’ चल रहे नेता भी अब दिल्ली दरबार की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी युवाओं और महिला चेहरों को ज्यादा महत्व देने की योजना पर काम कर रही है। गुजरात की तर्ज पर यहां भी ‘फ्रेश चेहरों’ को आगे लाने की चर्चा संगठन में चल रही है। कुछ वरिष्ठ नेताओं को लगने लगा है कि उनकी कुर्सी पर अब खतरा मंडराने लगा है। वही युवा नेता, जो अब तक किनारे पर खड़े थे, अब ‘पॉलिटिकल सेंट्रल स्टेज’ पर आने की तैयारी में हैं।
राजनीति में यह कहा जाता है कि दिल्ली की हर रणनीति का ‘टेस्ट रन’ गुजरात में होता है और फिर वह अन्य राज्यों में लागू होती है। ऐसे में यह मान लेना गलत नहीं होगा कि गुजरात की इस हलचल का असर पहाड़ की राजनीति पर देर-सबेर दिखेगा ही। दीपावली का यह पर्व उत्तराखंड में सत्ता के गलियारों में ‘रोशनी’ से ज्यादा ‘गर्मी’ लेकर आया है।
हर मंत्री और विधायक अब यह सोच रहा है—कहीं अगली सूची में उसका नाम तो नहीं? और यही डर इस सियासी मौसम को और भी दिलचस्प बना रहा है। दीपों के इस त्यौहार में पहाड़ की सत्ता के भीतर उठती ये ‘सियासी चिंगारियां’ आने वाले महीनों में किसी बड़े राजनीतिक आतिशबाज़ी की भूमिका भी बन सकती हैं।











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