उत्तराखंड की राजनीति में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्रालय जैसी अत्यंत संवेदनशील जिम्मेदारी संभालने वाली कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति श्री गिरधारी लाल साहू द्वारा सार्वजनिक मंच से दिया गया एक कथित बयान सामने आया। इस बयान में उन्होंने कहा कि “बिहार से 20–25 हजार रुपये में लड़कियां आसानी से मिल जाती हैं”।
यह बयान सामने आते ही राजनीतिक, सामाजिक और महिला संगठनों में गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोगों का कहना है कि यह कथन न केवल निंदनीय और शर्मनाक है, बल्कि यह महिलाओं और बच्चियों की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा पर सीधा प्रहार है।
मानव तस्करी और महिला शोषण को बढ़ावा देने वाला बयान
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की सोच और बयान मानव तस्करी, बाल विवाह, महिला शोषण और लैंगिक असमानता जैसी गंभीर सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देते हैं। एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश में इस प्रकार का बयान किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह बयान उस परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसकी सदस्य महिला सशक्तिकरण और बाल विकास जैसे मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सत्ता के आसपास इस तरह की मानसिकता मौजूद है, तो ज़मीन पर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर किए जा रहे दावे कितने खोखले हैं।
अंकिता भंडारी हत्याकांड की पृष्ठभूमि में और गंभीर हुआ मामला
उत्तराखंड पहले ही अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे गंभीर और संवेदनशील मामले को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। उस प्रकरण में सरकार और प्रशासन की भूमिका पर लगातार उंगलियां उठती रही हैं। ऐसे माहौल में महिलाओं को लेकर इस तरह का कथित बयान सरकार की महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण नीति पर और भी बड़े प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि एक तरफ सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और महिला सशक्तिकरण के नारे देती है, वहीं दूसरी ओर सत्ता से जुड़े लोग महिलाओं को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने वाले बयान दे रहे हैं।
तत्काल कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग
इस पूरे प्रकरण को लेकर यह मांग तेज हो गई है कि कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य को इस पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए, संबंधित बयान की सार्वजनिक रूप से निंदा करनी चाहिए और यदि बयान दिया गया है तो सार्वजनिक माफी के साथ जवाबदेही तय होनी चाहिए।
महिलाओं के सम्मान की लड़ाई सामूहिक जिम्मेदारी
यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच को उजागर करता है, जिसके खिलाफ समाज को एकजुट होकर खड़ा होना होगा। महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा केवल कानून या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार और संबंधित मंत्री इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या वास्तव में महिला सम्मान की बातों को ज़मीन पर उतारने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।











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