Uttarakhand news: देहरादून से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने सरकारी रिकॉर्ड प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देहरादून की पूर्व मेयर और उत्तराखंड की वरिष्ठ महिला नेता स्वर्गीय मनोरमा डोबरियाल शर्मा को उनके निधन के 11 साल बाद लोकसभा सचिवालय की ओर से आधिकारिक निमंत्रण पत्र भेजा गया।
यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकारी डाटाबेस और रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया कितनी कमजोर है।
क्या है पूरा मामला?
लोकसभा सचिवालय इन दिनों महिला संसदीय सदस्यों के योगदान को संकलित करने के लिए एक पुस्तक के संशोधित संस्करण पर काम कर रहा है। इसी क्रम में 20 मार्च 2026 को एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया, जिसमें स्व. मनोरमा डोबरियाल शर्मा को “Respected Madam” संबोधित करते हुए उनसे महिला नेतृत्व और समकालीन चुनौतियों पर लेख भेजने का आग्रह किया गया।
यह पत्र लोकसभा सचिवालय की संयुक्त सचिव ज्योचनामयी सिन्हा के हस्ताक्षर से जारी हुआ और देहरादून के अजबपुर कलां स्थित पुराने पते पर भेजा गया—जो लगभग 11 वर्ष पुराना है।
कौन थीं मनोरमा डोबरियाल शर्मा?
स्व. मनोरमा डोबरियाल शर्मा उत्तराखंड की राजनीति में एक सशक्त और प्रेरणादायक महिला चेहरा थीं।
- देहरादून की पहली महिला महापौर
- उत्तराखंड कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष
- वर्ष 2014 में चुनी गईं राज्यसभा की पहली महिला सांसद
उन्होंने अपने कार्यकाल में देहरादून के विकास, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक मुद्दों पर उल्लेखनीय कार्य किया। 18 फरवरी 2015 को 59 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उनके योगदान को आज भी प्रदेश में सम्मान के साथ याद किया जाता है।
सरकारी लापरवाही पर उठे सवाल
सबसे गंभीर बात यह है कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम “सक्रिय” स्थिति में दिखाई दे रहा है।
यह घटना इस ओर इशारा करती है कि:
- सरकारी डाटाबेस समय-समय पर अपडेट नहीं किए जा रहे
- विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी है
- संवेदनशील मामलों में भी बुनियादी जांच प्रक्रिया का अभाव है
परिवार की प्रतिक्रिया: सोशल मीडिया पर नाराजगी
इस घटना के बाद स्व. मनोरमा डोबरियाल शर्मा के बेटे विवेक शर्मा डोबरियाल ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने व्यंग्य करते हुए लिखा कि सरकार ने उनकी दिवंगत मां को एक महत्वपूर्ण परिचर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है, और उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वे “मां से निवेदन करेंगे कि वहां जाकर इनकी बुद्धि शुद्धि जरूर करें।”
उनकी यह प्रतिक्रिया तेजी से वायरल हो रही है और लोगों के बीच भी इस मामले को लेकर आक्रोश और हैरानी देखी जा रही है।
बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी खामी को उजागर करती है। सवाल यह उठता है कि:
- क्या सरकारी विभागों में डेटा वेरिफिकेशन की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
- क्या ऐसे मामलों में जवाबदेही तय की जाएगी?
- और क्या भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?
स्व. मनोरमा डोबरियाल शर्मा को 11 साल बाद भेजा गया यह निमंत्रण पत्र एक साधारण गलती नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। यह मामला न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश में प्रशासनिक सुधार की जरूरत को उजागर करता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस मामले में संबंधित विभाग क्या कार्रवाई करता है और क्या इस तरह की चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कदम उठाया जाता है या नहीं।













