विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल में देरी, ठेका प्रबंधन, तकनीकी बदलाव और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। हालांकि, उपलब्ध अभिलेखों से फिलहाल किसी व्यापक वित्तीय अनियमितता की पुष्टि नहीं होती, लेकिन करोड़ों रुपये की इन परियोजनाओं की प्रगति और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल जरूर खड़े होते हैं।
पिलंग पुल: पांच महीने में पूरा होना था काम, वर्षों बाद भी इंतजार
पिलंग में 48 मीटर लंबे पुल के निर्माण के लिए वर्ष 2021 में करीब 2.99 करोड़ रुपये की निविदा जारी की गई थी। इसकी अनुबंध राशि लगभग 3.21 करोड़ रुपये थी, जबकि निर्माण कार्य पूरा करने के लिए 150 दिन की समयसीमा निर्धारित की गई थी।
इसके बावजूद पुल का निर्माण लंबे समय तक अधूरा रहा। मई 2026 में तत्कालीन जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने निर्माणाधीन पुल का निरीक्षण कर संबंधित अधिकारियों को 15 अगस्त तक कार्य पूरा करने के निर्देश दिए थे।
अब इस परियोजना में वास्तविक भुगतान, माप पुस्तिका (Measurement Book) और शेष निर्माण कार्य की लागत का विवरण महत्वपूर्ण हो गया है। इन दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकेगा कि निर्धारित समयसीमा के मुकाबले निर्माण में इतनी देरी क्यों हुई।
जखोल-लिवाड़ी पुल: धीमी रफ्तार पर ठेका समाप्त, दोबारा निविदा की नौबत
जखोल-लिवाड़ी में 42 मीटर लंबे पुल के निर्माण की निविदा करीब 2.54 करोड़ रुपये की थी। परियोजना रिकॉर्ड के अनुसार इसकी स्वीकृत लागत 256.66 लाख रुपये थी, जबकि अब तक 108.61 लाख रुपये का व्यय दर्ज किया गया।
दस्तावेजों में धीमी निर्माण प्रगति को ठेका समाप्त करने का कारण बताया गया है। इसके बाद शेष कार्य के लिए पुनर्निविदा की प्रक्रिया शुरू की गई।
इस मामले में अब यह जानना जरूरी है कि ठेका समाप्त किए जाने तक संबंधित कार्यदायी संस्था को कितनी धनराशि का भुगतान किया गया था और अधूरे काम को पूरा कराने के लिए नई निविदा में कितनी लागत निर्धारित की गई।
राणा-बनास-दुर्बिल पुल: 36 से 42 और फिर 60 मीटर तक पहुंचा डिजाइन
राणा-बनास-दुर्बिल पुल परियोजना में तकनीकी बदलाव भी जांच और पड़ताल का विषय बन गए हैं। मूल योजना में यहां 36 मीटर स्पान का पुल प्रस्तावित था। बाद के दस्तावेजों में इसे बढ़ाकर 42 मीटर करने और नई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने का उल्लेख मिलता है।
इसके बाद वर्ष 2024 में इसी स्थान पर 60 मीटर स्पान के पुल के डिजाइन और प्लानिंग के लिए कंसल्टेंसी आमंत्रित की गई।
निर्माण स्थल की परिस्थितियों और तकनीकी जरूरतों के आधार पर डिजाइन में बदलाव संभव है, लेकिन इतने बड़े बदलाव के पीछे के तकनीकी कारण, संशोधित DPR की स्वीकृति और पहले किए गए कार्यों पर हुए खर्च का विवरण सामने आना जरूरी है।
गंगाड गाड़ पुल: निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर उठे सवाल, हुई विभागीय कार्रवाई
सौड़-ओसला मार्ग पर किलोमीटर 16 में स्थित गंगाड गाड़ पुल के निर्माण में गुणवत्ता संबंधी शिकायतें सामने आई थीं। वर्ष 2026 में BRIDCUL ने इस मामले में परियोजना प्रबंधक के खिलाफ कार्रवाई की थी। प्राथमिक जांच में निर्माण सामग्री को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई।
हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने अधिकार-क्षेत्र के आधार पर निलंबन आदेश निरस्त कर दिया। इसके बाद मामले की विभागीय जांच PWD स्तर पर आगे बढ़ी।
ऐसे में इस मामले को किसी अधिकारी की दोषसिद्धि के रूप में देखना उचित नहीं होगा। जांच पूरी होने और अंतिम निष्कर्ष सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी तय हो सकेगी।
थिरांग-सालंग पुल: सड़क निर्माण की रफ्तार पर भी पड़ा असर
थिरांग-सालंग में 90 मीटर लंबे पुल का निर्माण भी सड़क परियोजना की प्रगति को प्रभावित करता रहा। केंद्रीय प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) की स्वीकृति में इस पुल के लिए 9.30 करोड़ रुपये से अधिक की लागत निर्धारित की गई थी।
वर्ष 2024 के प्रगति रिकॉर्ड में सड़क का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद पुल का काम लंबित रहने के कारण निर्माण सामग्री और मशीनरी की आवाजाही प्रभावित होने का उल्लेख किया गया था।
इससे स्पष्ट होता है कि पुल निर्माण में देरी का असर केवल संबंधित पुल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे जुड़ी सड़क परियोजना और स्थानीय आवागमन पर भी पड़ता है।
BRIDCUL के बड़कोट कार्यालय का CAG ने किया था फील्ड ऑडिट
BRIDCUL के बड़कोट कार्यालय में 8 से 14 अक्टूबर 2024 तक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ओर से फील्ड ऑडिट किया गया था। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों से केवल ऑडिट की प्रक्रिया की पुष्टि होती है। अंतिम ऑडिट रिपोर्ट और आपत्तियां उपलब्ध हुए बिना किसी वित्तीय अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
जवाबदेही तय करने के लिए इन दस्तावेजों का मिलान जरूरी
इन सभी परियोजनाओं में स्वीकृत लागत, निविदा राशि, अनुबंध राशि और वास्तविक भुगतान के आंकड़े अलग-अलग हैं। इसलिए निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति और खर्च का आकलन करने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), अनुबंध पत्र (Agreement), माप पुस्तिका (Measurement Book), भुगतान बिल, समयवृद्धि आदेश, ठेका समाप्ति आदेश, पुनर्निविदा और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र (Completion Certificate) का मिलान जरूरी है।
फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं देते, लेकिन परियोजनाओं में देरी, बार-बार तकनीकी बदलाव, ठेका समाप्ति और गुणवत्ता संबंधी शिकायतें विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की लागत से स्वीकृत इन पुलों का निर्माण निर्धारित समय पर क्यों पूरा नहीं हो पाया और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? BRIDCUL की इन परियोजनाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना अब जरूरी हो गया है।














