हल्द्वानी: उत्तराखंड में पशुपालकों को दूध का उचित और सम्मानजनक खरीद मूल्य दिलाने की मांग को लेकर किसान मंच उत्तराखंड ने आंदोलन का ऐलान किया है। किसान मंच ने राज्य सरकार को दो सप्ताह का समय देते हुए कहा है कि यदि इस अवधि में पशुपालकों के हित में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा चंपावत से शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक पशुपालक किसान आंदोलन शुरू किया जाएगा।
किसान मंच ने यह घोषणा मंगलवार, 6 अक्टूबर को हल्द्वानी के मोती महल रेस्टोरेंट, नैनीताल रोड में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान की। संगठन का कहना है कि उसने आंदोलन को पहला विकल्प नहीं बनाया है। इससे पहले 1 अक्टूबर 2026 को निदेशक, डेयरी विकास विभाग, उत्तराखंड को ज्ञापन देकर सरकार और विभाग को समस्या के समाधान के लिए दो सप्ताह का समय दिया जा चुका है।
किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि संगठन पहले सरकार के साथ संवाद के जरिए समाधान चाहता है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार पशुपालकों की मांग पर सकारात्मक फैसला लेती है तो आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन मांग की अनदेखी होने पर चंपावत से आंदोलन शुरू किया जाएगा।
प्रेस वार्ता में प्रदेश प्रवक्ता कुसुम लता बौड़ाई, प्रदेश उपाध्यक्ष युवा पहाड़ी कमल तिवारी, संरक्षक पीयूष जोशी और हल्द्वानी ब्लॉक अध्यक्ष ललित मोहन जोशी मौजूद रहे।
किसान मंच ने पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए दूध के खरीद मूल्य को लेकर उत्तराखंड सरकार से सवाल उठाया। संगठन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में गाय के दूध का खरीद मूल्य ₹51 से बढ़ाकर ₹61 प्रति लीटर और भैंस के दूध का खरीद मूल्य ₹61 से बढ़ाकर ₹71 प्रति लीटर करने की घोषणा की गई है। इसके साथ ही दूध खरीद से जुड़ी प्रोत्साहन राशि को ₹3 से बढ़ाकर ₹6 प्रति लीटर करने की बात भी कही गई है।
प्रदेश प्रवक्ता कुसुम लता बौड़ाई ने कहा कि उत्तराखंड भी एक पहाड़ी राज्य है और यहां पशुपालन ग्रामीण परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। उनके मुताबिक चारा, पशु आहार, दवाइयों और पशुओं के इलाज समेत उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन पशुपालक को मिलने वाला दूध का मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहा।
उन्होंने कहा, “जब पशुपालक की लागत लगातार बढ़ रही है तो उसकी मेहनत से पैदा होने वाले दूध का सम्मानजनक मूल्य क्यों सुनिश्चित नहीं किया जा रहा?”
किसान मंच का कहना है कि पशुपालन केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और गांवों को आबाद रखने से भी जुड़ा है। संगठन ने सरकार से मांग की कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और पशुपालकों की वास्तविक लागत को ध्यान में रखते हुए दूध खरीद मूल्य को लेकर प्रभावी नीति बनाई जाए।
प्रदेश अध्यक्ष कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि किसान मंच ने सरकार को पहले ही पर्याप्त समय दिया है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार का दरवाजा पहले कागज लेकर खटखटाया है, भीड़ लेकर नहीं। दो सप्ताह का समय दिया है। सरकार चाहे तो मेज पर बैठकर पशुपालकों की समस्या का समाधान करे। लेकिन यदि पशुपालक की आवाज नहीं सुनी गई तो यही सवाल चंपावत की धरती से जनता के बीच उठेगा।”
उन्होंने कहा कि आंदोलन की शुरुआत चंपावत से करना प्रतीकात्मक भी होगा, क्योंकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चंपावत विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसान मंच के मुताबिक दो सप्ताह की समय-सीमा पूरी होने के बाद चंपावत के पशुपालकों के साथ बैठक और जनसंवाद किया जाएगा। इसके बाद आंदोलन की तारीख, स्थान और चरणबद्ध कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी।
कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो आंदोलन को चंपावत से कुमाऊं और फिर पूरे उत्तराखंड तक विस्तार दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पहाड़ों से पलायन रोकने और गांवों को बचाने की बात तभी सार्थक होगी, जब किसान और पशुपालक आर्थिक रूप से मजबूत होंगे।
प्रदेश उपाध्यक्ष युवा पहाड़ी कमल तिवारी ने कहा कि पहाड़ का युवा रोजगार के लिए मैदानों और दूसरे राज्यों की ओर जा रहा है। ऐसे में खेती और पशुपालन को आर्थिक रूप से मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि पशुपालन से परिवार को पर्याप्त आमदनी नहीं होगी तो नई पीढ़ी इस व्यवसाय को अपनाने से पीछे हटेगी।
हल्द्वानी ब्लॉक अध्यक्ष ललित मोहन जोशी ने कहा कि दूध के उचित मूल्य का मुद्दा किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि हल्द्वानी और नैनीताल क्षेत्र के पशुपालकों के साथ भी बैठक कर उन्हें अभियान से जोड़ा जाएगा। किसान मंच का दावा है कि चंपावत से आंदोलन शुरू होने पर कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों के पशुपालक भी इसमें समर्थन दे सकते हैं।
किसान मंच के संरक्षक पीयूष जोशी ने कहा कि संगठन अभी भी सरकार से संवाद की उम्मीद कर रहा है। यदि सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं होती है तो प्रदेश के किसान संगठनों, पशुपालक संगठनों, सामाजिक संगठनों और जनसंगठनों से आंदोलन के समर्थन की अपील की जाएगी।
उन्होंने कहा, “संघर्ष शुरू करने से पहले हम सौ बार संवाद के लिए तैयार हैं, लेकिन संघर्ष शुरू होने के बाद पशुपालक को बीच रास्ते में छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। लड़ाई शुरू होगी तो लोकतांत्रिक तरीके से अंत तक लड़ी जाएगी—जब तक सरकार की ओर से ठोस और सम्मानजनक समाधान सामने नहीं आता।”
किसान मंच ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित आंदोलन शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से किया जाएगा। संगठन ने राज्य सरकार से अपील की कि दो सप्ताह की समय-सीमा को आंदोलन की उलटी गिनती बनने देने के बजाय इसे समाधान का अवसर बनाया जाए।
किसान मंच का कहना है कि पशुपालक किसी तरह की खैरात नहीं मांग रहा, बल्कि अपनी मेहनत का उचित और सम्मानजनक मूल्य चाहता है। संगठन ने सरकार से दूध के खरीद मूल्य को लेकर जल्द ठोस निर्णय लेने की मांग की है।













