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कभी Iran और Israel दोस्त थे: फिर 1979 की एक क्रांति ने कैसे दोनों को बना दिया सबसे बड़े दुश्मन

March 6, 2026
in क्राइम
कभी Iran और Israel दोस्त थे: फिर 1979 की एक क्रांति ने कैसे दोनों को बना दिया सबसे बड़े दुश्मन
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मध्य-पूर्व की राजनीति को समझना दुनिया की सबसे जटिल पहेलियों में से एक है। यहां की सीमाएँ, धार्मिक पहचान, ऊर्जा संसाधन और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन — सब मिलकर ऐसी भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ बनाते हैं जिनका प्रभाव केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है।

इसी क्षेत्र में दो देशों के बीच चल रहा संघर्ष पिछले चार दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना हुआ है: Iran और Israel के बीच की प्रतिद्वंद्विता।

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यह केवल दो देशों की सैन्य प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसमें धार्मिक विचारधारा, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, परमाणु तकनीक, और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों का जटिल मिश्रण शामिल है।

विशेषज्ञ इसे अक्सर “shadow war” या “proxy conflict” कहते हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक सीधा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन तीसरे देशों और संगठनों के माध्यम से संघर्ष जारी रहा।

आज यह संघर्ष उस बिंदु तक पहुँच चुका है जहाँ कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह खुली जंग में बदल गया तो इसका प्रभाव केवल मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

जब Iran और Israel दुश्मन नहीं थे

आज की स्थिति देखकर यह समझना कठिन लगता है कि कभी ईरान और इज़राइल के बीच अच्छे संबंध थे।

1948 में इज़राइल की स्थापना के बाद अधिकांश अरब देशों ने उसे स्वीकार नहीं किया था। लेकिन उस समय ईरान के शासक Mohammad Reza Shah Pahlavi ने व्यावहारिक कूटनीति अपनाई और इज़राइल के साथ सहयोग बनाए रखा।

उस दौर में दोनों देशों के बीच:

  • आर्थिक सहयोग
  • सैन्य और खुफिया साझेदारी
  • कृषि और तकनीकी परियोजनाएँ

जैसे कई सहयोगी संबंध मौजूद थे।

इस सहयोग के पीछे एक रणनीतिक सोच भी थी। इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री David Ben-Gurion ने “Periphery Doctrine” नाम की नीति बनाई थी, जिसके अनुसार इज़राइल को अरब देशों के बाहर के क्षेत्रीय शक्तियों से संबंध मजबूत करने चाहिए।

ईरान इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं चली।

1979 की इस्लामी क्रांति: संबंधों का अंत

1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति ने देश की राजनीति और विदेश नीति को पूरी तरह बदल दिया।

क्रांति के नेता Ayatollah Ruhollah Khomeini ने पश्चिम समर्थित शाह शासन को समाप्त कर इस्लामी गणराज्य की स्थापना की।

नई सरकार ने:

  • इज़राइल को वैध राज्य मानने से इनकार कर दिया
  • सभी कूटनीतिक संबंध समाप्त कर दिए
  • फिलिस्तीनी आंदोलन का समर्थन शुरू किया

ईरान ने तेहरान में स्थित इज़राइल के दूतावास को बंद कर दिया और उसे फिलिस्तीनी संगठन को सौंप दिया।

यहीं से आधुनिक ईरान-इज़राइल संघर्ष की शुरुआत हुई।

विचारधारात्मक संघर्ष

ईरान और इज़राइल के बीच तनाव केवल भू-राजनीतिक नहीं बल्कि वैचारिक भी है।

ईरान की इस्लामी गणराज्य प्रणाली खुद को पश्चिमी प्रभाव और इज़राइल के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।

दूसरी ओर इज़राइल खुद को:

  • लोकतांत्रिक
  • पश्चिम समर्थक
  • और क्षेत्रीय सुरक्षा का रक्षक

के रूप में देखता है।

इस विचारधारात्मक टकराव ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया।

Proxy War: तीसरे देशों में संघर्ष

ईरान और इज़राइल के बीच अधिकांश संघर्ष सीधे युद्ध के रूप में नहीं बल्कि प्रॉक्सी युद्ध के रूप में सामने आया।

ईरान ने कई क्षेत्रीय संगठनों को समर्थन दिया जिनमें प्रमुख हैं:

  • Hezbollah (लेबनान)
  • Hamas (गाजा)

इज़राइल का आरोप है कि ये संगठन ईरान के समर्थन से उसके खिलाफ हमले करते हैं।

इसके जवाब में इज़राइल ने कई बार:

  • सीरिया में ईरानी ठिकानों पर हमले
  • खुफिया ऑपरेशन
  • और प्रॉक्सी समूहों पर सैन्य कार्रवाई

की है।

इस प्रकार यह संघर्ष कई बार लेबनान, सीरिया, गाजा और इराक जैसे देशों में दिखाई देता है।

Shadow War: गुप्त युद्ध

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दो दशकों में ईरान और इज़राइल के बीच एक “छाया युद्ध” चल रहा है।

इसमें शामिल हैं:

  • साइबर हमले
  • वैज्ञानिकों की हत्या
  • सैन्य ठिकानों पर गुप्त हमले
  • समुद्री जहाजों पर हमले

इन घटनाओं को अक्सर आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाने में इनकी बड़ी भूमिका रही है।

परमाणु कार्यक्रम: सबसे बड़ा विवाद

ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस संघर्ष का सबसे संवेदनशील मुद्दा है।

इज़राइल लंबे समय से यह कहता रहा है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है, जो उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा होगा।

ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है।

इस विवाद को हल करने के लिए 2015 में अंतरराष्ट्रीय समझौता किया गया जिसे Joint Comprehensive Plan of Action कहा जाता है।

इस समझौते के तहत:

  • ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी
  • अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार किया
  • आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिली

लेकिन इज़राइल ने इस समझौते की आलोचना की।

2024–2026: बढ़ता हुआ सैन्य तनाव

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।

2024 में ईरान ने पहली बार सीधे इज़राइल पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे। इनमें से अधिकांश को इज़राइल और उसके सहयोगियों ने रोक लिया।

इसके बाद दोनों देशों के बीच कई सैन्य कार्रवाइयाँ और जवाबी हमले हुए।

2026 में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया जब इज़राइल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले किए और ईरान ने जवाबी कार्रवाई की।

इन घटनाओं ने पूरे मध्य-पूर्व में बड़े युद्ध की आशंका को जन्म दिया।

Axis of Resistance

ईरान ने क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक नेटवर्क बनाया जिसे अक्सर “Axis of Resistance” कहा जाता है।

इस नेटवर्क में शामिल हैं:

  • लेबनान में Hezbollah
  • गाजा में Hamas
  • इराक और सीरिया के कुछ मिलिशिया
  • यमन में हौथी आंदोलन

इस नेटवर्क का उद्देश्य इज़राइल और उसके सहयोगियों के प्रभाव को चुनौती देना है।

इज़राइल इस नेटवर्क को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है।

अमेरिका की भूमिका

इस संघर्ष को समझने के लिए United States की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

अमेरिका लंबे समय से इज़राइल का सबसे बड़ा रणनीतिक सहयोगी रहा है।

अमेरिका:

  • इज़राइल को सैन्य सहायता देता है
  • ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है
  • और क्षेत्रीय सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाता है।

इस कारण ईरान-इज़राइल संघर्ष अक्सर अमेरिका और उसके सहयोगियों को भी प्रभावित करता है।

वैश्विक प्रभाव

अगर ईरान और इज़राइल के बीच पूर्ण युद्ध होता है तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा।

संभावित प्रभाव:

  1. तेल की कीमतों में भारी वृद्धि
  2. वैश्विक व्यापार में अस्थिरता
  3. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संकट

मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा क्षेत्रों में से एक है, इसलिए यहां की अस्थिरता पूरी दुनिया को प्रभावित करती है।

भारत के लिए महत्व

भारत के लिए भी यह संघर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • भारत का बड़ा तेल आयात मध्य-पूर्व से आता है
  • लाखों भारतीय इस क्षेत्र में काम करते हैं
  • भारत के ईरान और इज़राइल दोनों के साथ संबंध हैं

इस कारण भारत संतुलित कूटनीति अपनाता है।

क्या भविष्य में युद्ध होगा?

विशेषज्ञों के अनुसार इस संघर्ष के तीन संभावित भविष्य हो सकते हैं:

  1. सीमित तनाव और कूटनीतिक समाधान
  2. क्षेत्रीय युद्ध जिसमें कई देश शामिल हो जाएँ
  3. परमाणु संकट

हालांकि अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देश पूर्ण युद्ध से बचने की कोशिश करेंगे।

ईरान और इज़राइल के बीच संघर्ष आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे जटिल प्रतिद्वंद्विताओं में से एक है।

यह केवल दो देशों के बीच दुश्मनी नहीं बल्कि:

  • विचारधारा
  • क्षेत्रीय शक्ति संतुलन
  • परमाणु रणनीति
  • और वैश्विक राजनीति

का मिश्रण है।

आने वाले वर्षों में यह संघर्ष किस दिशा में जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय राजनीति किस तरह विकसित होती है।

 

Tags: Iran Israel conflict explained why Iran and Israel are enemies Iran Israel war history Middle East geopolitical conflict Iran nuclear program Israel threat Iran vs Israel latest tensions
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